देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में हाल ही में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे वित्तीय बाजारों में चर्चा तेज हो गई है। भारतीय रिजर्व बैंक यानी Reserve Bank of India (RBI) द्वारा जारी साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार फोरेक्स रिजर्व में कमी आई है, वहीं गोल्ड होल्डिंग की वैल्यू में भी गिरावट देखी गई है। विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है, क्योंकि इससे आयात भुगतान, विदेशी कर्ज और मुद्रा स्थिरता को संभालने में मदद मिलती है। ऐसे में रिजर्व में कमी को निवेशक और विश्लेषक गंभीरता से देखते हैं।
फोरेक्स रिजर्व में गिरावट के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला बड़ा कारण डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल है। जब रुपया कमजोर होता है, तो केंद्रीय बैंक को बाजार में डॉलर बेचकर मुद्रा को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार घटता है। दूसरा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी हो सकता है। यदि वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती है या अमेरिकी बॉन्ड यील्ड आकर्षक होती है, तो निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रिजर्व पर दबाव पड़ता है।
गोल्ड होल्डिंग की वैल्यू में गिरावट का संबंध अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों से जुड़ा होता है। यदि वैश्विक स्तर पर सोने के दाम घटते हैं, तो केंद्रीय बैंक के पास मौजूद सोने का कुल मूल्य भी कम हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि RBI ने सोना बेचा हो; कई बार सिर्फ कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण वैल्यू घट जाती है। इसके अलावा डॉलर की मजबूती भी सोने की कीमतों को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि आमतौर पर डॉलर मजबूत होने पर सोने के दाम दबाव में आते हैं।
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हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि रिजर्व में छोटी अवधि की गिरावट चिंता का विषय नहीं होती, यदि कुल स्तर अभी भी मजबूत है। भारत का फोरेक्स रिजर्व वैश्विक मानकों के अनुसार पर्याप्त माना जाता है, जिससे कई महीनों के आयात को कवर किया जा सकता है। RBI आमतौर पर मुद्रा स्थिरता बनाए रखने और आर्थिक संतुलन के लिए सक्रिय प्रबंधन करता है। इसलिए रिजर्व में उतार-चढ़ाव को व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है।
कुल मिलाकर, RBI के फोरेक्स रिजर्व और गोल्ड होल्डिंग में आई गिरावट वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, डॉलर की चाल और बाजार हस्तक्षेप जैसे कारकों का परिणाम हो सकती है। निवेशकों और आम लोगों को घबराने के बजाय आधिकारिक आंकड़ों और दीर्घकालिक रुझानों पर नजर रखनी चाहिए। आने वाले समय में वैश्विक संकेत और घरेलू आर्थिक गतिविधियां रिजर्व की दिशा तय करेंगी।