बैंकिंग और कैपिटल मार्केट से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए Reserve Bank of India (RBI) ने ब्रोकर फंडिंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है। नए निर्देशों के तहत बैंकों को शेयर ब्रोकरों या ब्रोकिंग संस्थाओं को दी जाने वाली फंडिंग के बदले 100% कोलैटरल लेना अनिवार्य किया गया है। यानी अब जितनी राशि का फंडिंग एक्सपोज़र होगा, उतनी ही पूरी वैल्यू का सुरक्षित गिरवी (कोलैटरल) रखना जरूरी होगा। यह कदम बाजार में बढ़ते लीवरेज, जोखिमपूर्ण ट्रेडिंग और संभावित डिफॉल्ट की आशंका को कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है। हाल के वर्षों में डेरिवेटिव्स और मार्जिन ट्रेडिंग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिससे वित्तीय स्थिरता पर दबाव की चिंता बढ़ी थी। RBI का मानना है कि पर्याप्त कोलैटरल से बैंकों का जोखिम कम होगा और सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ेगी।
इस फैसले का सीधा असर उन ब्रोकिंग कंपनियों पर पड़ेगा जो बैंकों से उधार लेकर ग्राहकों को मार्जिन फंडिंग देती थीं। अब उन्हें अतिरिक्त पूंजी की व्यवस्था करनी होगी या फिर अपने लेंडिंग मॉडल में बदलाव करना पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे शॉर्ट-टर्म में ट्रेडिंग वॉल्यूम पर असर पड़ सकता है, खासकर हाई-लीवरेज सेगमेंट में। हालांकि लंबी अवधि में यह कदम बाजार को अधिक स्थिर और सुरक्षित बनाने में मदद कर सकता है। बैंकों के लिए भी यह जरूरी था कि वे पूंजी बाजार से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित रखें, क्योंकि किसी बड़े डिफॉल्ट का असर पूरे वित्तीय तंत्र पर पड़ सकता है।
प्रोप ट्रेडिंग के लिए बैंक फंडिंग पर रोक
RBI के दूसरे बड़े फैसले के तहत बैंकों को प्रोपाइटरी ट्रेडिंग (Proprietary Trading) के लिए सीधे फंडिंग देने पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया है। प्रोप ट्रेडिंग वह व्यवस्था है जिसमें कोई ब्रोकिंग फर्म या वित्तीय संस्था अपने ही पैसे से बाजार में ट्रेड करती है ताकि मुनाफा कमा सके। जब इस तरह की गतिविधियों के लिए बैंक फंडिंग का इस्तेमाल होता है, तो जोखिम और बढ़ जाता है क्योंकि बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर बैंकिंग सिस्टम पर पड़ सकता है। इसी जोखिम को देखते हुए RBI ने स्पष्ट किया है कि बैंकों का पैसा सट्टा आधारित गतिविधियों में नहीं लगाया जाना चाहिए।
इस निर्णय को वित्तीय स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर भी कई देशों में बैंकों को उच्च जोखिम वाली ट्रेडिंग गतिविधियों से दूर रखने के लिए सख्त नियम लागू हैं। भारत में भी पूंजी बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है और रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है। ऐसे में यदि प्रोप ट्रेडिंग में अत्यधिक लीवरेज का उपयोग होता है और बाजार में अचानक गिरावट आती है, तो उसका असर बैंकिंग सेक्टर तक पहुंच सकता है। RBI का यह कदम इसी संभावित खतरे को पहले से नियंत्रित करने की कोशिश है।
कुल मिलाकर, ब्रोकर फंडिंग पर 100% कोलैटरल अनिवार्य करना और प्रोप ट्रेडिंग के लिए बैंक फंडिंग पर रोक लगाना बाजार में अनुशासन लाने की दिशा में अहम कदम है। इससे अल्पकाल में ट्रेडिंग गतिविधि पर दबाव दिख सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह निवेशकों के हित और वित्तीय प्रणाली की मजबूती के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। आने वाले समय में बाजार इन नए नियमों के अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करेगा और ब्रोकिंग कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल में आवश्यक बदलाव करने होंगे।